अमेरिका को मिसाइल और अन्य खतरों से बचाने के लिए ट्रंप सरकार ने अपने 'गोल्डन डोम' मिसाइल डिफेंस सिस्टम के लिए आउटर स्पेस में क्षमता बढ़ाने की तैयारी की है
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दुनिया के बड़े देशों के बीच पिछले कुछ वर्षों में हथियारों की अपनी ताकत को बढ़ाने की होड़ बढ़ी है। स्पेस में भी हथियारों को पहुंचाने का दौर शुरू हो गया है। इसकी शुरुआत अमेरिका ने पहला 'ऑन-ऑर्बिट' वेपन तैनात करने के साथ की है। इसके साथ अमेरिका ने रूस और चीन जैसे अपने प्रतिद्वंदियों को चुनौती दी है।
एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, US एयर फोर्स के सेक्रेटरी, Troy Meink ने एयर, स्पेस और सायबर कॉन्फ्रेंस में कहा है कि दुश्मनों के खिलाफ अमेरिकी सैन्य बलों की सुरक्षा के लिए 'ऑन-ऑर्बिट' वेपन जरूरी है। इसे रूस और चीन के लिए एक चेतावनी माना जा रहा है। हालांकि, Meink ने यह नहीं बताया है कि स्पेस में अमेरिका ने किस प्रकार का वेपन तैनात किया है। उन्होंने संकेत दिया कि इस वेपन का इस्तेमाल बढ़ते हुए खतरों के खिलाफ किया जाएगा। अमेरिका को मिसाइल और अन्य खतरों से बचाने के लिए ट्रंप सरकार ने अपने 'गोल्डन डोम' मिसाइल डिफेंस सिस्टम के लिए आउटर स्पेस में क्षमता बढ़ाने की तैयारी की है।
स्पेस में सैन्य ताकत बढ़ाने की होड़ 1957 में तत्कालीन सोवियत संघ के पहले सैटेलाइट 'Sputnik' के लॉन्च के साथ शुरू हो गई थी। इसके बाद अमेरिका और रूस ने सैटेलाइट्स को हथियारों से लैस करने और उन्हें नष्ट करने के तरीके खोजना शुरू कर दिया था। स्पेस में परमाणु हथियारों को लेकर आशंकाएं को दूर करने के लिए अमेरिका और रूस के साथ ही कुछ अन्य देशों ने 1967 में आउटर स्पेस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते के तहत, स्पेस में बड़े स्तर पर विध्वंस करने वाले हथियारों पर प्रतिबंध लगाया गया था। इसके बाद से अमेरिका, रूस, चीन और भारत जैसे ताकतवर देशों ने इस समझौते के दायरे के बाहर अपनी क्षमताओं को बढ़ाने की कोशिशें की हैं। इन क्षमताओं में सैन्य कम्युनिकेशन, निगरानी और नेविगेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले प्रतिद्वंदी देशों के सैटलाइट्स को निशाना बनाने की ताकत शामिल है।
अमेरिका की स्पेस फोर्स के प्रवक्ता ने एक स्टेटमेंट में बताया, 'दुश्मन के हमले का मुकाबला करने के लिए अमेरिका के पास ऑन-ऑर्बिट कंट्रोल वेपन मौजूद हैं।' हालांकि, इस स्टेटमेंट में इस वेपन के बारे में जानकारी नहीं दी गई है। अमेरिका को स्पेस में रूस और चीन जैसे दो बड़े प्रतिद्वंदियों से खतरा हो सकता है। चीन की योजना अपनी मिलिट्री के मॉडर्नाइजेशन की स्ट्रैटेजी के हिस्से के तौर पर स्पेस में अपनी ताकत बढ़ाने की है। रूस का मानना है कि भविष्य में होने वाले टकरावों में स्पेस में ताकत एक निर्णायक कारण होगा।
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