चीन का प्रोजेक्ट प्रोटोटाइपिंग फेज में आ चुका है। मंगल ग्रह पर लैंडिंग के बाद स्थिर लैंडर मंगल की सतह पर 7 फीट तक ड्रिल करेगा।
Photo Credit: NASA
China Tianwen-3 मिशन 2031 तक मंगल की सतह से पहला सैम्पल लेकर लौट सकता है।
मंगल से मिट्टी लाने की होड़ में चीन अब NASA को पछाड़ता दिख रहा है। चीन का तियानवेन-3 मिशन लॉन्च होने के कगार पर है। मिशन का टारगेट है 2031 में धरती पर लौटना और वो भी मंगल की चट्टानों और मिट्टी के सैम्पल लेकर। China Tianwen-3 मिशन के आगे NASA की तैयारी अभी सुस्त लग रही है। नासा के मंगल मिशन को लेकर अभी तक कोई भी निश्चित भविष्य नजर नहीं आ रहा है। वहीं, चीन दुनिया पहला ऐसा देश बनने की राह पर है जो धरती पर पहली बार मंगल की मिट्टी लेकर आएगा! आइए जानते हैं चीन और नासा इस रेस में कहां तक पहुंचे हैं।
China Tianwen-3 मिशन 2031 तक मंगल की सतह से पहला सैम्पल लेकर लौट सकता है। चीन का तियानवेन-3 मिशन 2028 में लॉन्च हो सकता है और यह तीन साल के भीतर मंगल से उसकी मिट्टी और पत्थरों के टुकड़े लेकर लौट सकता है। चीन का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट उसे मंगल ग्रह से सैम्पल पृथ्वी पर लाने वाला पहला देश बना सकता है और यह नासा के अनिश्चित 'मार्स सैंपल रिटर्न' मिशन से भी पहले हो सकता है। नोटबुकचेक रिपोर्ट के अनुसार, तियानवेन-3 मिशन के चीफ साइंटिस्ट होउ जेंगक्यूआन ने हाल ही में चीन की सरकारी मीडिया को बताया था मिशन 2028 में लॉन्च होने और 2031 में सैंपल वापस लाने की योजना के अनुसार आगे बढ़ रहा है।
होउ जेंगक्यूआन ने बताया है कि प्रोजेक्ट प्रोटोटाइपिंग फेज में आ चुका है। मगर स्पेसक्राफ्ट को लॉन्च के लिए अभी पूरी तरह से तैयार नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि इसमें अभी कई बड़ी तकनीकी चुनौतियाँ बाकी हैं। मिशन में दो लॉन्ग मार्च 5 रॉकेट का इस्तेमाल हो सकता है। इसमें से एक रॉकेट लैंडर को लेकर जाएगा और दूसरा ऑर्बिटर को ले जाएगा।
मंगल ग्रह पर लैंडिंग के बाद स्थिर लैंडर मंगल की सतह पर 7 फीट तक ड्रिल करेगा और वहां से 500 ग्राम यानी आधा किलो के लगभग मिट्टी और चट्टानों को इकट्ठा कर सीधे मंगल की कक्षा में भेजेगा। ऑर्बिट में पहले से मौजूद ऑर्बिटर सैम्पल कंटेनर को पकड़ लेगा और उसे वापस पृथ्वी पर ले जाएगा। ऐसा अनुमान है कि मंगल की सतह पर होने वाला यह मिशन लगभग दो महीने तक भी चल सकता है।
NASA का मिशन कहां तक पहुंचा
NASA का पर्सेवरेंस रोवर 2021 में मंगल पर पहुँचने के बाद से ही सैंपल इकट्ठा कर रहा है। मगर नासा के पास रिटर्न मिशन के लिए अभी कोई भी निश्चित योजना नहीं दिख रही है। नासा को सैम्पल लेकर लौटने के लिए नए मिशन की जरूरत पड़ेगी। मगर चीन की रणनीति बहुत सधी हुई है। वह एक ही बार में मंगल पर पहुंचेगा और उसी मिशन में ही सैम्पल वापस लेकर लौट आएगा। देखा जाए तो सरल आर्किटेक्चर से चीने के मिशन की तकनीकी जटिलता और लागत, दोनों ही कम हो सकती हैं।
उधर नासा के मंगल मिशन की लागत लगातार बढ़ती जा रही है। NASA के प्लान की लागत का अनुमान 7 बिलियन डॉलर से 11 बिलियन डॉलर के बीच तक जा सकता है। यह चिंता भी है कि लागत और भी बढ़ सकती है। फंडिंग को लेकर अनिश्चितता की वजह Perseverance के सैंपल वापसी के लिए कोई स्पष्ट समय सीमा तय ही नहीं हो पाई है। चीन नासा की इस बेबसी का फायदा जरूर उठा सकता है।
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