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पृथ्‍वी को ‘भट्टी’ बना रहे AC होंगे ‘इको-फ्रेंडली’! वैज्ञानिकों ने खोज लिया तरीका, आप भी जानें

अनुमान के मुताबिक गर्मियों में जो बिजली खर्च होती है, वह दुनियाभर में बिजली आपूर्ति का लगभग दसवां हिस्‍सा है।

पृथ्‍वी को ‘भट्टी’ बना रहे AC होंगे ‘इको-फ्रेंडली’! वैज्ञानिकों ने खोज लिया तरीका, आप भी जानें

स्‍टडी कहती है कि ऐसा करके हम सदी के अंत तक वैश्विक तापमान में 0.09 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से बच सकते हैं।

ख़ास बातें
  • AC आपके घर को तो ठंडा रखते हैं, लेकिन आसपास का तापमान बढ़ता है
  • AC के रेफ्रिजरेंट के रूप में ‘प्रोपेन’ पर स्विच करने से हालात बदल जाएंगे
  • IIASA के रिसर्चर पल्लव पुरोहित के नेतृत्व में की गई स्‍टडी में चला पता
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दुनियाभर के शहरों में तापमान में बढ़ोतरी होने से एयर कंडीशनर के इस्‍तेमाल और डिमांड में इजाफा हुआ है। इससे पर्यावरण पर खतरा और बढ़ गया है। एयर कंडीशनर (AC) ना सिर्फ बिजली की खपत करते हैं, बल्कि इनके रेफ्र‍िजरेंट में वार्मिंग क्षमता भी ज्‍यादा होती है। इसे आप यूं समझ सकते हैं कि AC आपके घर को तो ठंडा रखते हैं, लेकिन इनकी वजह से आसपास के तापमान को बढ़ने में मदद मिलती है। अब एक स्‍टडी में पता चला है कि AC के रेफ्रिजरेंट के रूप में ‘प्रोपेन' (propane) पर स्विच करने से वैश्विक तापमान में हो रही बढ़ोतरी कम हो सकती है। 

रिपोर्ट के अनुसार गर्मियों के मौसम में दुनियाभर के शहरों में स्‍पेस कूलर का इस्‍तेमाल बढ़ जाता है। इनमें सबसे ज्‍यादा यूज होते हैं AC, उनमें भी स्प्लि‍ट AC। अनुमान के मुताबिक गर्मियों में जो बिजली खर्च होती है, वह दुनियाभर में बिजली आपूर्ति का लगभग दसवां हिस्‍सा है। यही रुझान जारी रहा, तो साल 2050 तक स्‍पेस कूलर की ऊर्जा डिमांड तीन गुना बढ़ जाएगी। ऊर्जा की खपत में बढ़ोतरी और स्‍पेस कूलर के विभ‍िन्‍न तरीकों से पर्यावरण पर खतरा भी बढ़ जाएगा।   

स्प्लिट-एयर कंडीशनर (स्प्लिट AC) जो पाइप से जुड़ी एक इनडोर और आउटडोर एयर यूनिट का इस्‍तेमाल करते हैं, स्पेस-कूलिंग के लिए इस्‍तेमाल होने वाले सबसे आम उपकरण हैं। ये ज्यादातर HCFC-22 और HFC-410 को रेफ्रिजरेंट के रूप में उपयोग करते हैं। दोनों ही रेफ्र‍िजरेंट में हाई ग्लोबल वार्मिंग क्षमता है। यानी इनकी वजह से हमारे वायुमंडल के तापमान में बढ़ोतरी होती है। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि ये रेफ्रिजरेंट 100 साल में कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 2,256 गुना अधिक गर्मी जनरेट करते हैं। 

हालांकि मैन्‍युफैक्‍चरर्स ऐसे रेफ्र‍िजरेंट खोजने में जुटे हैं, जो वायुमंडल में कम गर्मी पैदा करें। HFC-32 भी एक विकल्‍प बनकर उभरा है, लेकिन यह पूरी तरह कामयाब नहीं है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम और लीड्स यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स के सहयोग से IIASA के रिसर्चर पल्लव पुरोहित के नेतृत्व में की गई एक स्‍टडी में इसमें कामयाबी मिलती दिख रही है। स्‍टडी कहती है कि प्रोपेन पर स्विच करके ग्‍लोबल वॉर्मिंग से लड़ने में मदद मिल सकती है। स्‍टडी कहती है कि ऐसा करके हम सदी के अंत तक वैश्विक तापमान में 0.09 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से बच सकते हैं।

यह स्‍टडी प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज ऑफ यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका (PNAS) में प्रकाशित हुई है। रिसर्चर्स ने तमाम रेफ्रि‍जरेंट को परखा, जिसमें प्रोपेन बेहतर समाधान साबित हुआ। पल्‍लव कहते हैं कि 7 किलोवाट तक के स्प्लिट-एसी में प्रोपेन को तकनीकी रूप से इस्‍तेमाल किया जा सकता है। हालांकि प्रोपेन का इस्‍तेमाल करने वाले स्प्लिट-एसी मार्केट्स में मौजूद हैं, लेकिन इनका इस्‍तेमाल उस तरीके से नहीं हो रहा। पल्‍लव कहते हैं कि क्‍लाइमेट न्‍यूट्रैलिटी के लक्ष्‍यों को पूरा करने के लिए जल्‍द एक्‍शन लेने की जरूरत है।  
 

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ये भी पढ़े: Science News, global warming, AC, Air Conditioner, propane, Study
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