केंद्र सरकार ने IT Rules में संशोधन कर AI-जनरेटेड कंटेंट को रेगुलेटरी दायरे में ला दिया है। 20 फरवरी से लागू होने वाले नए नियमों के तहत ऐसे कंटेंट पर साफ लेबल लगाना और तेजी से टेकेडाउन करना अनिवार्य होगा।
Photo Credit: Anthropic
AI कंटेंट पर लेबल लगाना अब अनिवार्य
AI से तैयार ऑडियो, वीडियो और विजुअल कंटेंट को लेकर केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। सूचना प्रौद्योगिकी (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules में संशोधन कर AI-जनरेटेड कंटेंट को औपचारिक रूप से रेगुलेटरी दायरे में ला दिया गया है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) की ओर से जारी अधिसूचना के मुताबिक नए नियम 20 फरवरी से लागू होंगे। संशोधित नियमों के तहत “synthetically generated information” की स्पष्ट परिभाषा दी गई है और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारियां तय की गई हैं। चलिए विस्तार से जानते हैं।
नए नियमों के अनुसार (via LiveLaw.in) ऐसा ऑडियो, विजुअल या ऑडियो-विजुअल कंटेंट जो कंप्यूटर रिसोर्सेज की मदद से इस तरह बदला या तैयार किया गया हो कि वह असली व्यक्ति या वास्तविक घटना जैसा प्रतीत हो, उसे “synthetically generated information” माना जाएगा। इसमें डीपफेक और AI इम्परसनेशन जैसे मामले भी शामिल हो सकते हैं, जहां कंटेंट को असली और नकली के बीच पहचानना मुश्किल हो जाता है।
सरकार के मुताबिक जिन प्लेटफॉर्म्स पर यूजर्स इस तरह का कंटेंट बना या शेयर कर सकते हैं, उन्हें अब यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसे कंटेंट पर साफ हो और उनमें मुख्य रूप से “synthetically generated” का लेबल लगा हो। बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे Instagram, X और LinkedIn को यूजर्स से यह घोषणा भी लेनी होगी कि अपलोड किया गया कंटेंट AI-जनरेटेड है या नहीं।
संशोधित नियमों में नियम 3 के तहत एन्फोर्समेंट टाइमलाइन भी काफी कम कर दी गई है। वैलिड टेकेडाउन गाइडलाइन्स का पालन करने की समयसीमा 36 घंटे से घटाकर 3 घंटे कर दी गई है। शिकायत निपटान की अवधि 15 दिनों से घटाकर 7 दिन कर दी गई है। इमरजेंसी शिकायतों के लिए जवाब देने का समय 72 घंटे से कम होकर 36 घंटे कर दिया गया है। कुछ मामलों में कंटेंट हटाने की समयसीमा 24 घंटे से घटाकर 2 घंटे कर दी गई है।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि प्लेटफॉर्म अवैध या हानिकारक AI-जनरेटेड कंटेंट हटाने के लिए ऑटोमेटेड टूल्स का इस्तेमाल करते हैं, तो उन्हें IT Act के तहत मिलने वाला “safe harbour” संरक्षण नहीं खोना पड़ेगा।
जहां तकनीकी रूप से संभव हो, वहां ऐसे कंटेंट में स्थायी मेटाडेटा या प्रोविनेंस मैकेनिज्म जोड़ना होगा, जिसमें एक यूनिक आइडेंटिफायर शामिल हो सकता है। इसका उद्देश्य यह पहचानना है कि कंटेंट किस कंप्यूटर रिसोर्स से तैयार या संशोधित किया गया है।
हालांकि अधिसूचना में यह भी कहा गया है कि सामान्य या अच्छे इरादे से की गई एक्टिविटी जैसे एडिटिंग, फॉर्मेटिंग, ट्रांसक्रिप्शन, ट्रांसलेशन, एक्सेसिबिलिटी एन्हांसमेंट, एजुकेशनल केंटेंट या रिसर्च आउटपुट इन नियमों से बाहर रहेंगे, बशर्ते वे भ्रामक इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड तैयार न करें।
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