MIT के रिसर्चर ने अब एक छोटा अल्ट्रासाउंड सिस्टम तैयार किया है। इसके बाद ब्रेस्ट अल्ट्रासाउंड को घर पर या डॉक्टर के क्लिनिक में करना आसान हो जाएगा।
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स्तन कैंसर के मामलों में लगातार इजाफा हो रहा है।
भारत समेत दुनिया भर में स्तन कैंसर (Breast Cancer) के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। यह महिलाओं में अब सबसे आम कैंसर बन रहा है। अब स्तन कैंसर के अधिक जोखिम वाली महिलाओं के लिए रेगुलर अल्ट्रासाउंड चेकअप से ट्यूमर का जल्दी पता लगाने में मदद मिल सकती है। MIT के रिसर्चर ने अब एक छोटा अल्ट्रासाउंड सिस्टम तैयार किया है। इसके बाद ब्रेस्ट अल्ट्रासाउंड को घर पर या डॉक्टर के क्लिनिक में करना आसान हो जाएगा। आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।
नए सिस्टम में एक छोटा अल्ट्रासाउंड प्रोब है जो एक एक्वीजीशन और प्रोसेसिंग मॉड्यूल से जुड़ा है, जिसका साइज स्मार्टफोन से थोड़ा ही बड़ा है। इस सिस्टम को लैपटॉप कंप्यूटर से कनेक्ट करके कहीं भी उपयोग किया जा सकता है। इससे वाइड-एंगल 3डी इमेज को रियल-टाइम में रिकंस्ट्रक्ट करने के साथ देखा जा सकता है। एमआईटी में मीडिया आर्ट्स और साइंस की एसोसिएट प्रोफेसर और स्टडी की सीनियर लेखिका कैनन डैगडेविरेन का कहना है कि सब कुछ काफी कॉम्पैक्ट है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में या जो लोग इस टेक्नोलॉजी तक पहुंच नहीं सकते हैं, उनके लिए इसका उपयोग आसान हो सकता है। उनका कहना है कि इस सिस्टम से काफी हद तक ट्यूमर का जल्दी पता लगाया जा सकता है, जिससे सफल ट्रीटमेंट की संभावना बढ़ जाती है।
कॉलिन मार्कस पीएचडी '25 और एमआईटी के पूर्व पोस्टडॉक्टरल रिसर्चर एमडी उस्मान गोनी नईम इस रिसर्चपेपर के मुख्य लेखक हैं। यह एडवांस्ड हेल्थकेयर मैटेरियल्स जर्नल में प्रकाशित हुआ है। रिसर्च पेपर के अन्य लेखक में MIT के ग्रेजुएट स्टूडेंट आस्था शाह, जेसन हाउ और श्रीहरि विश्वनाथ, एमआईटी की समर इंटर्न और सेंट्रल फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी की ग्रेजुएट स्टूडेंट माया यूसेबियो, एमआईटी मीडिया लैब के रिसर्च स्पेशलिस्ट डेविड सदात, एमआईटी के प्रोवोस्ट अनंत चंद्रकासन और मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल के स्तन कैंसर सर्जन टोल्गा ओजमेन शामिल हैं।
कई स्तन ट्यूमर का नियमित मैमोग्राम एक्स-रे का उपयोग के जरिए पता चल जाता है, लेकिन ट्यूमर वार्षिक मैमोग्राम के बीच भी विकसित हो सकते हैं। इन ट्यूमर को इंटरवल कैंसर के तौर पर जाना जाता है, सभी स्तन कैंसर के मामलों में 20-30 प्रतिशत होते हैं और ये नियमित स्कैन के दौरान पाए जाने वाले ट्यूमर के मुकाबले में ज्यादा आक्रामक होते हैं। इन ट्यूमर का जल्दी पता लगाना बहुत जरूरी है। जब स्तन कैंसर का डिटेक्ट शुरुआती अवस्था में हो जाता है, तो बचने की दर लगभग 100 प्रतिशत होती है। हालांकि, बाद के समय में ट्यूमर का पता चलने पर यह दर घटकर लगभग 25 प्रतिशत हो जाती है।
रेगुलर मैमोग्राम के अलावा ज्यादा बार अल्ट्रासाउंड स्कैन कराने से शुरुआती फेज में ही ट्यूमर का पता लगाने में मदद मिल सकती है। वर्तमान में अल्ट्रासाउंड आमतौर पर सिर्फ तभी किया जाता है जब मैमोग्राम में कोई संदिग्ध एरिया नजर आता है। इस उद्देश्य के लिए इस्तेमाल की जाने वाली अल्ट्रासाउंड मशीनें बड़ी और महंगी होती हैं और इनको इस्तेमाल करने के लिए अधिक ट्रेन टेक्नीशियन की जरूरत होती है। विश्वनाथ का कहना है कि इन मशीन को चलाने के लिए स्किल अल्ट्रासाउंड टेक्नीशियनों की जरूरत होती है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में अल्ट्रासाउंड की सुविधा उपलब्ध करवाना बहुत बड़ी दिक्कत है, जहां पर स्किल रेडियोलॉजिस्ट बहुत कम हैं।
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