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इंसान के मरने के बाद अब उससे बनाई जाएगी पेड़-पौधों के लिए खाद! इस देश में हुई शुरुआत

अमेरिका में, 2019 में वाशिंगटन में सबसे पहले इसकी शुरुआत की गई थी।

इंसान के मरने के बाद अब उससे बनाई जाएगी पेड़-पौधों के लिए खाद! इस देश में हुई शुरुआत

Photo Credit: NBC

ह्यमन कंपोस्टिंग में मृत शरीर को एक खास प्रकिया से गुजारा जाता है।

ख़ास बातें
  • पारंपरिक दफन में प्राकृतिक संसाधनों का खर्च आता है
  • ह्यूमन कंपोस्टिंग बन रहा मरने का एक ईको फ्रेंडली तरीका
  • ह्यमन कंपोस्टिंग में एक खास प्रकिया इस्तेमाल की जाती है
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मरने के बाद इन्सानी शरीर किसी काम नहीं आता है। लेकिन अब इसे काम लाए जाने की शुरुआत हो चुकी है। पश्चिमी देशों में मरने के उपरान्त इंसानी शरीर को खाद में तब्दील करने की शुरुआत हो चुकी है। इस कड़ी में अब न्यूयॉर्क भी शामिल हो गया है जहां पर इंसानी शरीर को मरने के बाद खाद बनाने की मंजूरी दे दी गई है। इसे ह्यूमन कम्पोस्ट भी कहा जाता है। 

न्यूयॉर्क में अब ह्यूमन कंपोस्टिंग को मंजूरी दे दी गई है। जिसके बाद अब अगर कोई नागरिक चाहे तो वह मरने से पहले अपनी इच्छा बताकर अपने शरीर को खाद में तब्दील करवा सकता है। इसे मरने का इको फ्रेंडली तरीका बताया जा रहा है। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक इसमें जलाने या दफनाने की बजाए मृत शरीर के साथ दूसरी प्रक्रिया इस्तेमाल की जाती है जिससे कि शरीर खाद में बदल जाता है और मिट्टी के साथ मिल जाता है।

अमेरिका में, 2019 में वाशिंगटन में सबसे पहले इसकी शुरुआत की गई थी। उसके बाद कोलाराडो, वर्मॉन्ट और कैलिफोर्निया भी इस कड़ी में जुड़ गए। अब न्यूयॉर्क में भी इस प्रक्रिया को मंजूरी दे दी गई है जिसके बाद यह अमेरिका का छठा राज्य है जिसमें ह्यूमन कंपोस्टिंग अब लीगल हो गई है। यहां के गर्वनर कैथी होचुल ने इस पर मुहर बीते दिनों मुहर लगाई है।  

ह्यमन कंपोस्टिंग (Human composting) में एक खास प्रकिया इस्तेमाल की जाती है। इसमें एक बंद कंटेनर में मृत शरीर को रखा जाता है। शरीर के साथ लकड़ी के कुछ टुकड़े, जो बेहद पतले होते हैं, अल्फाल्फा और एक तरह की घास रखी जाती है। इसे इस तरह से रखा जाता है कि धीरे धीरे यह जीवाणुओं के कारण टूट टूटकर खाद में बदल जाता है। लगभग एक महीने के बाद इसे गर्म करके एक प्रक्रिया से गुजारा जाता है जिससे कि हानिकारक कीटाणु इसमें से मार दिए जाते हैं और इस तैयार मिट्टी को  उनके परिजनों का सौंप दिया जाता है। इस मिट्टी को फूलों के पौधों, सब्जियों और पेड़ों में खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। 

इसके लिए कुछ फर्म भी वहां काम करती हैं जिनमें रिकम्पोज भी शामिल है। फर्म का कहना है कि यह इस तरह की सर्विसेज मुहैया करवाती है। इससे पारंपरिक दफनाने की प्रक्रिया या जलाने की प्रक्रिया का विकल्प उपलब्ध करवा कर प्रतिवर्ष हजारों किलो कार्बन को कम किया जा सकता  है। चूंकि कार्बन डाइऑक्साइड क्लाइमेट चेंज, ग्लोबल वॉर्मिंग का मुख्य कारण मानी जाती है। इससे धरती का तापमान बढ़ रहा है और यह लगातार गर्म हो रही है। इसलिए ह्यूमन कंपोस्टिंग इसे रोकने में भी सहायक सिद्ध होगी, ऐसा माना जा रहा है। 

पारंपरिक दफन में जो कॉफिन इस्तेमाल होता है उसमें लकड़ी की लागत आती है, अलग से जमीन की जरूरत होती है और उसके अलावा भी कई तरह के प्राकृतिक संसाधनों का खर्च उसमें आता है। इसलिए ह्यूमन कंपोस्टिंग मरने का एक ईको फ्रेंडली तरीका माना जा रहा है। इसके अलावा इस प्रक्रिया का समर्थन करने वाले लोगों का ये भी कहना है कि इससे न केवल पर्यावरण को फायदा होगा बल्कि यह ऐसे शहरों में भी काफी उपयोगी सिद्ध होगा जहां पर दफनाने लायक जमीन लगातार कम होती जा रही है। 
 
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ये भी पढ़े: Human composting, human compost, CO2, green death
हेमन्त कुमार

हेमन्त कुमार Gadgets 360 में सीनियर सब-एडिटर हैं और विभिन्न प्रकार के ...और भी

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