150 साल तक जी सकेगा इंसान! नई स्टडी पर एक्सपर्ट्स का जवाब

जर्नल में 150 साल की आयु को संभव बनाना एक काल्पनिक विचार कहा गया है। लेकिन वहीं, कुछ शोधकर्ता कह रहे हैं कि मनुष्य दीर्घ आयु के संबंध में एक बड़ी उपलब्धि पाने के कगार पर है।

150 साल तक जी सकेगा इंसान! नई स्टडी पर एक्सपर्ट्स का जवाब

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वैज्ञानिकों के लिए यह बहस का विषय है कि आदमी 150 साल तक जीवित रह सकता है या नहीं?

ख़ास बातें
  • 150 साल की आयु को संभव बनाना एक काल्पनिक विचार कहा गया है।
  • 20वीं शताब्दी में मृत्यु दर में कमी देखी गई।
  • एंटी-एजिंग टेक्नोलॉजी में बहुत तेजी से प्रगति हो रही है।
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मनुष्य पृथ्वी पर मौजूद सबसे उन्नत प्राणियों में से है। इसके पास सभी तरह के संसाधन हैं और मनचाही प्रगति करने की क्षमता है। लेकिन क्या मनुष्य अपनी उम्र को बढ़ा सकता है? क्या यह संभव है कि मनुष्य 150 साल तक जी सके? और सिर्फ जीना ही नहीं, एक स्वस्थ लम्बा जीवन! वैज्ञानिकों के लिए यह बहस का विषय है कि आदमी 150 साल तक जीवित रह सकता है या नहीं? एक जर्नल में 150 साल की आयु को संभव बनाना एक काल्पनिक विचार कहा गया है। लेकिन वहीं, कुछ शोधकर्ता कह रहे हैं कि मनुष्य दीर्घ आयु के संबंध में एक बड़ी उपलब्धि पाने के कगार पर है। तो क्या हम 150 साल की लंबी आयु को हासिल करने के करीब हैं? आइए जानते हैं इस स्टडी में। 

Nature जर्नल में एक स्टडी प्रकाशित की गई जिसमें कहा गया कि 20वीं शताब्दी में मृत्युदर में कमी देखी गई थी, लेकिन यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया कि यह कमी 21वीं शताब्दी में भी जारी रहेगी या नहीं। होर्वाथ क्लॉक (Horvath Clock) को बनाने वाले एक्सपर्ट Steve Horvath इस संबंध में अहम बात कहते हैं। होर्वाथ क्लॉक एक एपिजेनेटिक बायोलॉजिकल क्लॉक है जो किसी व्यक्ति की जैविक आयु निर्धारित करने के लिए इस्तेमाल की जा सकती है। यानी कोई व्यक्ति कितने साल जियेगा, इस क्लॉक के माध्यम से पता लगाया जा सकता है। 

Steve Horvath का कहना है कि एंटी-एजिंग टेक्नोलॉजी में बहुत तेजी से प्रगति हो रही है। बहुत जल्द ही मनुष्य उस मुकाम तक पहुंच सकता है जहां वह 150 साल तक भी जीवित रह सकता है। होर्वाथ का शोध कोशिकीय स्तर पर वृद्धावस्था को मापने पर केंद्रित है। इससे वैज्ञानिकों को यह जानने में मदद मिलती है कि एंटी-एजिंग थैरेपी का कोशिकीय स्तर पर कितना प्रभाव होता है। होरवाथ ने डीएनए मेथाइलेशन (DNA methylation) पर आधारित एक परीक्षण विकसित किया, जो जीन को कंट्रोल करने में सहायक कैमिकल मॉडिफिकेशन है। ऐसा माना जाता है कि यह विभिन्न ऊतकों (tissues) में किसी व्यक्ति की जैविक आयु का अंदाजा लगा सकता है।

पुणे स्थित हेल्थ एंड वेलनेस प्लेटफॉर्म iThrive की सीईओ और संस्थापक, पोषण विशेषज्ञ मुग्धा प्रधान ने NDTV को बताया कि यह डीएनए मेथाइलेशन पैटर्न का अध्ययन करता है जिसे अक्सर "एपीजेनेटिक क्लॉक" कहा जाता है, ताकि यह समझा जा सके कि जैविक आयु बढ़ना कालानुक्रमिक आयु (chronological age) से कैसे अलग हो सकता है। उन्होंने कहा कि मिथाइलेशन इस पूरी पहेली का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा है। मानव स्वास्थ्य के साथ-साथ जीवनकाल भी कई अन्य कारकों से काफी प्रभावित होता है। जिसमें आंतों का स्वास्थ्य, पोषक तत्वों की स्थिति, दीर्घकालिक तनाव, सूजन, पर्यावरणीय विषाक्त पदार्थ, नींद और जीवनशैली यानी लाइफस्टाइल भी शामिल है। 

आधुनिक चिकित्सा की मदद से जीवनकाल में बढ़ोत्तरी देखी गई है। डायलिसिस, वेंटिलेटर, पेसमेकर और दवाओं के सहारे लोगों को लंबे समय तक जीवित रखा जा सकता है। लेकिन इससे उनकी आत्मनिर्भरता या जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होती है। कई मामलों में सामने आता है कि भले ही जीवनकाल में वृद्धि हुई है लेकिन स्वास्थ्यकाल कम हो गया है। आईथ्राइव की संस्थापक ने कहा कि असल दीर्घायु का मतलब केवल लंबे समय तक जीवित रहना नहीं होना चाहिए। इसमें गतिशील रहना, मानसिक रूप से तेज रहना, भावनात्मक रूप से संतुलित रहना और बाद के दशकों में भी आत्मनिर्भर रहना शामिल है। उन्होंने आगे कहा कि 100 वर्ष तक जीना तभी सार्थक है जब आप उन वर्षों को भरपूर ऊर्जा, उद्देश्य और योगदान के साथ जी सकें।

एक्सपर्ट ने कहा कि सच्चा जवाब यह है कि हम पूर्ण निश्चितता के साथ नहीं जान सकते कि कितना लंबा जी सकते हैं। ये क्लॉक भविष्यसूचक मॉडल हैं, गारंटी नहीं। ऐसी घड़ियां संभावना पर काम करती हैं, भाग्य पर नहीं। हालांकि यह प्रगति आशाजनक है, लेकिन 150 साल का जीवनकाल हासिल करने के लिए रीजेनरेटिव मेडिसिन, जीन थेरेपी और सेलुलर रिपेयर में महत्वपूर्ण सफलताओं की आवश्यकता होगी।
 

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हेमन्त कुमार

हेमन्त कुमार Gadgets 360 में सीनियर सब-एडिटर हैं और विभिन्न प्रकार के ...और भी

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