स्टूडेंट्स अगर AI टूल्स का इस्तेमाल बहुत जल्दी शुरू कर देते हैं, तो उनमें आलोचनात्मक सोच और समस्या-समाधान के बुनियादी कौशल, यानी प्रॉब्लम सॉल्विंग क्षमता विकसित नहीं हो पाती है।
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AI के इस्तेमाल से व्यापक स्तर पर ज्ञान का स्तर गिरने या आलोचनात्मक सोच की क्षमता में गिरावट आने की चिंता
ChatGPT का इस्तेमाल आप भी हरेक काम में करने लगे हैं तो जरा सावधान हो जाइए! AI पर बहुत अधिक निर्भरता आपका दिमाग खराब कर सकती है! ऐसा हम नहीं, एक रिसर्च कहती है। पिछले साल हुए एक शोध ने ChatGPT के इस्तेमाल पर एक बहस छेड़ दी। इसमें 60 के लगभग स्टूडेंट्स को शामिल किया गया और पाया गया कि ChatGPT का इस्तेमाल करने वालों में दिमागी क्षमता कम होने के लक्षण मिले। आइए जानते हैं स्टडी ChatGPT के इस्तेमाल को लेकर क्या कहती है।
ChatGPT को आए अभी करीबन 4 साल का समय ही हुआ है। लेकिन इसके आने के बाद से यूजर्स ने इसे अपने हाथ का खिलौना बना लिया है। Reuters के अनुसार, इस AI ऐप को दुनियाभर में प्रति सप्ताह 90 करोड़ से ज्यादा यूजर्स इस्तेमाल करते हैं। जबकि हर महीने यह 1 अरब लोगों द्वारा इस्तेमाल होता है। यह दुनिया में सबसे तेजी से अपनाया जाने वाला ऐप है। लेकिन क्या आप जानते हैं यह ऐप आपके दिमाग की क्षमता को कम कर सकता है?
ChatGPT के आने के बाद से ही इस बात पर बहस चल रही है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीकों का 'सीखने पर' यानी लर्निंग की क्षमता पर क्या प्रभाव पड़ता है। इसे लेकर कई शोध भी हो चुके हैं और इसके नतीजे काफी चिंताजनक हैं। परिणाम बताते हैं कि ChatGPT का लगातार इस्तेमाल दिमागी क्षमता को प्रभावित करता है। पिछले साल MIT के वैज्ञानिकों ने रिसर्च में पाया कि निबंध लेखन में ChatGPT का उपयोग करने से संज्ञानात्मक बोझ (cognitive debt) और सीखने के कौशल में कमी (decrease in learning skills) की समस्या हो सकती है। रिसर्चगेट में रिसर्च को प्रकाशित किया गया है।
रिसर्च बताती है AI के इस्तेमाल से व्यापक स्तर पर ज्ञान का स्तर गिरने या आलोचनात्मक सोच की क्षमता में गिरावट आने की चिंता बनी हुई है। तर्क यह है कि स्टूडेंट्स अगर AI टूल्स का इस्तेमाल बहुत जल्दी शुरू कर देते हैं, तो उनमें आलोचनात्मक सोच और समस्या-समाधान के बुनियादी कौशल, यानी प्रॉब्लम सॉल्विंग क्षमता विकसित नहीं हो पाती है।
रिसर्च के चार महीनों के दौरान, MIT की टीम ने 54 वयस्कों से तीन निबंधों की एक सीरीज़ लिखने को कहा। प्रतिभागियों के पास तीन विकल्प थे। इसके लिए उन्होंने या तो AI (ChatGPT) का इस्तेमाल किया, या सर्च इंजन (Google Search आदि) का, या फिर सिर्फ अपने दिमाग का ही इस्तेमाल किया। टीम ने दिमाग में होने वाली इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी और निबंधों के भाषाई विश्लेषण के जरिए कॉग्निटिव एंगेजमेंट को मापा।
स्टडी में पाया गया कि जिन लोगों ने AI का इस्तेमाल किया, उनका कॉग्निटिव एंगेजमेंट बाकी दो ग्रुप्स के मुकाबले काफी कम था। इस ग्रुप के लोगों को अपने निबंधों से कोट्स (Quotes) याद करने में भी ज़्यादा मुश्किल हुई और उन्हें उन निबंधों पर अपनापन भी कम महसूस हुआ। इससे पता चलता है कि AI के लंबे समय तक इस्तेमाल से पार्टिसिपेंट्स में "कॉग्निटिव डेट" (मानसिक क्षमता पर बोझ) पैदा हो गया। जब उन्हें आखिरकार अपने दिमाग का इस्तेमाल करने का मौका मिला, तो वे दूसरे दो ग्रुप्स की तरह जुड़ाव महसूस नहीं कर पाए या उतना अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाए।
निष्कर्ष ये निकलता है कि AI या ChatGPT का इस्तेमाल करना कोई गलत बात नहीं है, लेकिन किसी चीज पर बहुत अधिक निर्भरता हमारी स्वयं की क्षमताओं को कम कर देती है। इसे एक साधारण बात से समझा जा सकता है जब दुनिया में केल्कुलेटर (Calculator) आए। उससे पहले इंसान अपने दिमाग के इस्तेमाल से गणनाएं करता था। लेकिन जब दिमाग को एक सहारा मिल गया तो उसकी क्षमता कम हो गई। फिर छोटी-छोटी गणनाएं करना भी मुश्किल लगने लगता है, भारी लगने लगता है। ChatGPT के साथ भी ऐसी ही समस्याएं पैदा होने की संभावनाएं जुड़ी पाई गई हैं।
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