5.5 फीट के भारतीय पहलवान को Google ने Doodle में किया याद, जानें कौन थे केडी जाधव

केडी जाधव अपने पांच भाईयों में सबसे छोटे थे।

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Written by हेमन्त कुमार, अपडेटेड: 15 जनवरी 2023 11:36 IST
ख़ास बातें
  • इनका कद केवल 5.5 फीट का था।
  • 10 साल की छोटी उम्र से ही पहलवानी के गुर सीखने लगे थे।
  • 14 अगस्त 1984 को उनका जीवनकाल समाप्त हो गया।

Google ने 97वीं जयंती पर भारतीय पहलवान केडी जाधव याद किया है।

Photo Credit: Google

Google ने आज Doodle के माध्यम से खशाबा दादा साहेब जाधव को याद किया है। केडी जाधव स्वतंत्र भारत में ओलंपिक में पहला व्यक्तिगत पदक पाने वाले पहलवान थे। केडी जाधव का जन्म 15 जनवरी 1926 को महाराष्ट्र के गोलेश्वर नाम के गांव में हुआ था। आज उनकी 97वीं जयंती पर गूगल ने उनको याद किया है। इन्होंने 1952 में हेलसिंकी ओलंपिक में ब्रॉन्ज मेडल जीता था। केडी जाधव का व्यक्तित्व बहुत निराला था। उनकी पहलवानी के कई किस्से हैं जो काफी रोचक हैं। 

Google ने 97वीं जयंती पर उनको याद किया है। इनके व्यक्तित्व की सबसे खास बात थी कि इनका कद केवल 5.5 फीट का था। यानि कि आमतौर पर लम्बे तगड़े हट्टे-कट्टे पहलवानों में ये शुमार नहीं थे। बावजूद इसके अपने दांव पेचों से ये बड़े बड़े पहलवानों को मात दे देते थे। इनके खेल की खास बात ये थी कि ये ताकत की बजाए तकनीक पर ज्यादा भरोसा करते थे। लम्बा तगड़ा शरीर न होने के बावजूद भी ये अपने तकनीक के बलबूत ही अच्छे अच्छे पहलवानों को चित्त कर देते थे। 

केडी जाधव अपने पांच भाईयों में सबसे छोटे थे। पहलवानी के साथ साथ इनको तैराकी भी आती थी। गूगल के अनुसार 10 साल की छोटी उम्र से ही यह अपने पिताजी के साथ पहलवानी के गुर सीखने लगे थे और वहीं से इनकी पहलवानी के करियर की शुरुआत हुई। हेड लॉकिंग के माहिर केडी जाधव अपने से कई किलो भारी पहलवान को उठाकर जमीन पर पटक देते थे। अंतर्राष्ट्रीय कुश्ती फॉर्मेट में वे भले ही नए थे लेकिन पहली बार में ही उन्होंने इस फॉर्मेट में छठा स्थान हासिल किया था। उस वक्त तक भारत में ऐसा किसी ने नहीं किया था।  

ब्रॉन्ज मेडल जीतने के बाद वह गोल्ड के लिए तैयारी कर रहे थे। लेकिन किस्मत ने उनका यहां पर साथ नहीं दिया और मैच से कुछ समय पहले ही उनको घुटने में चोट लग गई जिसके कारण वो गोल्ड मेडल के लिए नहीं खेल सके। बल्कि यहां तक कि उनका घुटना इस तरह से चोटिल हुआ था कि उसके बाद वो आगे खेल ही नहीं पाए। उसके बाद वो खेल करियर से हट गए और एक पुलिस सर्विस में अपना योगदान दिया। 14 अगस्त 1984 को उनका जीवनकाल समाप्त हो गया। कुश्ती में उनके योगदान के लिए सन् 2000 में उनको अर्जुन पुरस्कार मिला लेकिन यह उनकी मृत्यु के लगभग दो दशक बाद दिया गया। 
 

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