इजरायल-गाजा युद्ध: 76 लाख पेट्रोल कारों के बराबर निकला कार्बन! रिपोर्ट में खुलासा

रिपोर्ट के मुताबिक यह उत्सर्जन 2024 में जॉर्डन के कुल कार्बन उत्सर्जन के बराबर था।

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Written by हेमन्त कुमार, अपडेटेड: 18 मार्च 2026 16:09 IST
ख़ास बातें
  • युद्ध में 3.3 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर उत्सर्जन हुआ था।
  • यह उत्सर्जन 2024 में जॉर्डन के कुल कार्बन उत्सर्जन के बराबर था।
  • 76 लाख पेट्रोल कारों के वार्षिक उत्सर्जन के बराबर निकली कार्बन!

इजराइल और गाजा के युद्ध में 3.3 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर उत्सर्जन हुआ था।

Photo Credit: The Guardian

इजरायल और गाजा के युद्ध में 3.3 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर उत्सर्जन हुआ था। यह खुलासा एक स्टडी में किया गया है जो बताता है कि युद्ध के कारण पर्यावरण को कितना भारी नुकसान झेलना पड़ा। रिसर्च चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखती है। इसमें बताया गया है कि मिलिट्री ऑपरेशन, निर्माण गतिविधियों और युद्धोत्तर पुनर्निर्माण की गतिविधियों के कारण किस कदर उत्सर्जन पर्यावरण देखने को मिला। 

इजरायल-गाजा युद्ध के बाद के परिणामों को बयां करती यह रिसर्च हाल ही में One Earth जर्नल में प्रकाशित हुई। यह रिसर्च लंदन के क्वीन मैरी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में की गई थी और इसमें लैंकेस्टर विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ भी शामिल थे। युद्ध के दौरान यह सैन्य अभियानों, निर्माण गतिविधियों और युद्धोत्तर पुनर्निर्माण के कारण होने वाले उत्सर्जन का विस्तृत आकलन इस शोध में दिया गया है। 

कार्बन उत्सर्जन कितना बड़ा था इसे समझने के लिए एक उदाहरण यहां पर दिया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक यह उत्सर्जन 2024 में जॉर्डन के कुल कार्बन उत्सर्जन के बराबर था। यह 76 लाख पेट्रोल कारों के वार्षिक उत्सर्जन या एक वर्ष में 3.3 करोड़ एकड़ से अधिक जंगलों द्वारा अवशोषित कार्बन की मात्रा के बराबर बताया गया है। स्टडी में पाया गया कि सक्रिय युद्ध से ही 13 लाख टन से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन हुआ। इसमें तोपखाने, रॉकेट और अन्य मिलिट्री उपकरणों से होने वाला उत्सर्जन शामिल है। इसके अलावा रक्षात्मक संरचनाओं के निर्माण और क्षतिग्रस्त सड़कों, घरों और बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण से भी कार्बन फुटप्रिंट में काफी बढ़ोत्तरी हुई।

इस स्टडी के प्रमुख शोधकर्ता बेंजामिन नीमार्क के अनुसार, युद्ध में मानवीय और आर्थिक नुकसान सबको दिखाई देता है लेकिन युद्ध का पर्यावरणीय पर प्रभाव शायद ही कभी मापा जाता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि लड़ाईयों से ग्रीनहाउस गैसों की बड़ी मात्रा उत्पन्न हो सकती है, चाहे वह लड़ाई के दौरान हो या फिर लड़ाई खत्म होने के बाद। शोधकर्ताओं का कहना है कि ग्लोबल क्लाइमेट रिपोर्ट अक्सर सैन्य उत्सर्जन को शामिल नहीं करती हैं। इसका सीधा सा मतलब यह है कि युद्ध के वास्तविक जलवायु प्रभाव का पूरी तरह से आकलन नहीं किया जाता है। इस दृष्टि से देखें तो युद्ध कहीं ज्यादा घातक साबित होते हैं। 
 

 

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हेमन्त कुमार Gadgets 360 में सीनियर ...और भी

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