सिर्फ गेम नहीं था Pokemon Go, अनजाने में यूजर्स बना रहे थे असली दुनिया का मैप

Pokemon Go खेलते समय यूजर्स ने अनजाने में 30 अरब इमेज का डेटाबेस बना दिया। अब इसी डेटा का इस्तेमाल रोबोट और लोकेशन टेक्नोलॉजी में किया जा रहा है।

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Written by नितेश पपनोई, अपडेटेड: 17 मार्च 2026 12:00 IST
ख़ास बातें
  • Pokemon Go यूजर्स ने अनजाने में 30 अरब इमेज का डेटा बनाया
  • Niantic Spatial इस डेटा से Visual Positioning System तैयार कर रही
  • Coco Robotics के डिलीवरी रोबोट इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहे

Pokemon Go के जरिए बना डेटा अब रोबोट्स को रास्ता दिखा रहा

Photo Credit: Pixabay/ stux

Pokemon Go ने साल 2016 में पूरी दुनिया में लोगों को घर से बाहर निकाल दिया था। इस वर्चुअल गेम की वजह से भारी तादात में लोग पार्क, सड़कों और आसपास की जगहों में दिखाई देने लगे, क्योंकि इस गेम में प्लेयर्स को अपने फोन लेकर वर्चुअल पोकेमोन पकड़ने होते हैं। उस समय यह सिर्फ एक एंटरटेनमेंट ट्रेंड लग रहा था, लेकिन अब सामने आई रिपोर्ट बताती है कि उसी गेमप्ले के दौरान यूजर्स अनजाने में एक बेहद बड़ा रियल वर्ल्ड इमेज डेटाबेस तैयार कर रहे थे। यह डेटा अब रोबोटिक्स और लोकेशन टेक्नोलॉजी जैसी नई तकनीकों को विकसित करने में इस्तेमाल हो रहा है। यह पूरा मामला Niantic के पॉपुलर गेम Pokemon Go से जुड़ा है, जिसने ऑगमेंटेड रियलिटी टेक्नोलॉजी के जरिए डिजिटल दुनिया को असली लोकेशन्स के साथ जोड़ दिया था। चलिए आपको विस्तार से समझाते हैं।

Pokemon Go ने कैसे बनाया इतना बड़ा डेटा?

करीब एक दशक पहले लॉन्च हुआ Pokemon Go दुनियाभर में तेजी से पॉपुलर हुआ था, जिसमें भारत भी शामिल था। इस गेम में यूजर्स को असली दुनिया में घूमकर पोकेमोन पकड़ने होते थे। NewsForce के मुताबिक, इस दौरान गेम के जरिए और अन्य AR ऐप्स के माध्यम से करीब 30 अरब रियल वर्ल्ड इमेज का एक बड़ा डेटासेट तैयार हो गया। जब भी यूजर किसी लोकेशन, जैसे किसी स्मारक या जिम को स्कैन करता था, तब वह अनजाने में इस डेटाबेस का हिस्सा बन रहा था।

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स्कैनिंग के दौरान सिर्फ फोटो नहीं, और भी डेटा रिकॉर्ड हुआ!

गेम में कई बार यूजर्स को खास जगहों को अपने फोन से स्कैन करने के लिए कहा जाता था, ताकि गेम ज्यादा सटीक काम कर सके। लेकिन इन स्कैनिंग से कथित तौर पर सिर्फ फोटो ही नहीं, बल्कि और भी कई तरह का डेटा रिकॉर्ड हुआ। इसमें लोकेशन कोऑर्डिनेट्स, कैमरा का एंगल, फोन की मूवमेंट और दूसरे सेंसर से जुड़ी जानकारी भी शामिल थी। अकेले देखने पर यह सब सामान्य गेमप्ले जैसा लगता था, लेकिन जब करोड़ों यूजर्स का डेटा एक साथ जुड़ा, तो इससे दुनिया का बेहद डिटेल्ड विजुअल मैप तैयार हो गया।

30 अरब इमेज से बना 3D वर्ल्ड मैप

रिपोर्ट के मुताबिक, Niantic का कहना है कि इस डेटा में अलग-अलग एंगल, लाइटिंग और समय पर ली गई तस्वीरें शामिल हैं। ये डेटा एक मिलियन से ज्यादा रियल वर्ल्ड लोकेशन्स को कवर करता है। हर इमेज के साथ सटीक स्पेशियल जानकारी जुड़ी होने की वजह से यह डेटासेट एक तरह का मल्टी एंगल 3D मैप बनाता है, जिसमें सड़कें, बिल्डिंग्स और पब्लिक स्पेस को विस्तार से समझा जा सकता है। इसी डेटा के आधार पर कंपनी के AI स्पिनऑफ Niantic Spatial नई टेक्नोलॉजी पर काम कर रही है।

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Visual Positioning System क्या है?

Niantic Spatial इस डेटासेट का इस्तेमाल करके एक Visual Positioning System (VPS) तैयार कर रही है। यह सिस्टम सिर्फ GPS पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि कैमरे से दिखने वाले सीन को अपने डेटाबेस से मैच करके लोकेशन तय करता है। यह खासतौर पर उन जगहों पर काम आता है जहां GPS सिग्नल सही नहीं मिलता, जैसे भीड़भाड़ वाले शहर या ऊंची बिल्डिंग्स के बीच। ऐसे मामलों में GPS कई मीटर तक गलत लोकेशन दिखा सकता है।

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रोबोट कैसे कर रहे हैं डेटा का इस्तेमाल?

यह टेक्नोलॉजी अब Coco Robotics नाम की कंपनी इस्तेमाल कर रही है, जो लास्ट माइल डिलीवरी रोबोट बनाती है। बता दें कि कंपनी के हजारों रोबोट अमेरिका और यूरोप के शहरों में काम कर रहे हैं। ये रोबोट सड़क पर चलकर ग्रोसरी या फूड डिलीवर करते हैं और करीब 5 मील प्रति घंटे की स्पीड से चलते हैं। सही डिलीवरी के लिए इन्हें बिल्कुल सटीक लोकेशन पर पहुंचना जरूरी होता है।

रोबोट अपने कैमरों से आसपास का सीन कैप्चर करते हैं और उसे Niantic के डेटाबेस से मैच करते हैं। इसके साथ GPS को मिलाकर यह अपनी लोकेशन ज्यादा सटीक तरीके से तय कर पाते हैं।

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समाज कल्याण या धोखेबाजी?

सरल शब्दों में समझें तो जो डेटा कभी यूजर्स को गेम में पोकेमोन ढूंढने में मदद करता था, वही अब असली दुनिया में रोबोट्स को रास्ता दिखा रहा है। यह पूरा मामला दिखाता है कि कैसे एक साधारण दिखने वाला मोबाइल गेम समय के साथ बड़ी टेक्नोलॉजी का आधार बन सकता है। हालांकि, इसमें यह बात भी सामने आती है कि यूजर्स कई बार बिना जाने ही बड़े डेटा सिस्टम का हिस्सा बन जाते हैं, जिसे कई एक्सपर्ट्स 'चीटिंग' से जोड़ते हैं। निश्चित रूप से आने वाले हफ्तों में ये यूजर प्राइवेसी व ट्रांसपेरेंसी को लेकर एक बड़ी बहस का मुद्दा बन सकता है। 

 

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