बेल्जियम के आधे जितनी बर्फ पिघली! अंटार्कटिका से मिल रहे संकट के संकेत

वैज्ञानिकों ने सैटेलाइट्स की मदद से बर्फ की निगरानी की और 30 साल के डेटा को मिलाकर पाया कि इसकी बर्फ 42 किलोमीटर तक पीछे हट चुकी है।

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Written by हेमन्त कुमार, अपडेटेड: 8 मार्च 2026 15:38 IST
ख़ास बातें
  • अंटार्कटिका की बर्फ 42 किलोमीटर तक पीछे हट गई है।
  • 1990 से लेकर 2025 तक का सैटेलाइट डेटा शोधकर्ताओं ने स्टडी किया।
  • यह खत्म हुई बर्फ आधे बेल्जियम के बराबर है।

अंटार्कटिका की बर्फ पीछे हट रही है। वैज्ञानिकों ने सैटेलाइट्स की मदद से डेटा स्टडी किया।

Photo Credit: iStock

अंटार्कटिका की बर्फ में एक हैरान करने वाली गतिविधि वैज्ञानिकों ने दर्ज की है। अंटार्कटिका की बर्फ को लेकर स्टडी की गई है जिसमें एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। लगभग 30 सालों तक बर्फ की निगरानी करने के बाद वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि अंटार्कटिका की बर्फ 42 किलोमीटर तक पीछे हट गई है। इन्हें ग्राउंड लाइन कहा जाता है यानी ऐसे बिंदु जहां पर बर्फ जमीन को छोड़ देती है और तैरना शुरू कर देती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ये ग्राउंडिंग लाइन्स अब 42 किलोमीटर तक पीछे हट चुकी हैं। क्या हैं इसके मायने, आइए जानते हैं। 

अंटार्कटिका की बर्फ पीछे हट रही है। वैज्ञानिकों ने सैटेलाइट्स की मदद से बर्फ की निगरानी की और 30 साल के डेटा को मिलाकर पाया कि इसकी बर्फ 42 किलोमीटर तक पीछे हट चुकी है। यह दूरी ग्राउंडिंग लाइन्स के आधार पर बताई गई है। ग्राउंडिंग लाइन्स (grounding lines) या हिमरेखा बर्फ पर ऐसे बिंदु होते हैं जहां से बर्फ जमीन को छोड़ देती है और पानी पर तैरने लगती है। बर्फ की ये लाइन्स अब 42 किलोमीटर तक पीछे हट चुकी हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफॉर्निया की ओर से स्टडी को Proceedings of the National Academy of Sciences में प्रकाशित किया गया है। 

1990 से लेकर 2025 तक का सैटेलाइट डेटा शोधकर्ताओं ने स्टडी किया है। स्टडी बताती है कि महाद्वीप से 12,800 वर्ग किलोमीटर बर्फ गायब हो चुकी है। यह बर्फ आधे बेल्जियम के बराबर है। वैज्ञानिकों का कहना है कि समुद्र के पानी का गर्म होना इसमें एक अहम रोल अदा करता है। 'ध्रुवीय गहरे जल' के नाम से जानी जाने वाली एक धारा बर्फ की परतों के नीचे बहती है, जो उन्हें नीचे से पिघला देती है। जैसे-जैसे बर्फ पतली होती जाती है चट्टान पर उसकी पकड़ कमजोर होती जाती है। ऐसा होने पर हिमरेखा भीतर खिसक जाती है। यह इस बात का संकेत है कि बर्फ की चादर कमजोर हो रही है।

हालांकि, स्टडी से यह भी पता चलता है कि अंटार्कटिका की 77% से अधिक तटरेखा स्थिर बनी हुई है। लेकिन यदि ये जमीनी रेखाएं पीछे हटती रहीं तो बर्फ का पिघलना तेज हो सकता है और वैश्विक समुद्री जलस्तर में वृद्धि हो सकती है। इस स्टडी के लिए शोधकर्ताओं ने यूरोपियन स्पेस एजेंसी (ESA) द्वारा संचालित कोपरनिकस सेंटिनल-1 मिशन के डेटा पर भरोसा किया। ये उपग्रह रडार का इस्तेमाल करते हैं जो बादलों और अंधेरे में भी देख सकते हैं। इससे ये पूरे साल ध्रुवीय क्षेत्र की निगरानी कर पाते हैं और डेटा इकट्ठा कर पाते हैं। 
 

 

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हेमन्त कुमार Gadgets 360 में सीनियर ...और भी

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